मैं नज़रों के किनारे से,
नज़रों को चुराता हूँ
उलझी ज़ुल्फों मे ख़ुद को,
खोया हुआ सा पाता हूँ।
बादलों से अठखेलियां कर,
मैं जब भी मुस्कुराता हूँ
छोटी छोटी सी इन आँखों मे,
बस आसुओं को ही पाता हूँ।
बहुत टूटा हुआ सा दिल,
बहुत बिखरा हुआ सा मन
मै जब भी गुनगुनाता हूँ
धड़कनों को रुलाता हूँ।
नए सुर है, नए रुख है,
जमाने के थपेड़ों में
मगर फिर भी संभालता हूँ,
संभल कर पाँव रखता हूँ।
कहीं रंगी बहारों मे,
कहीं रंगी नजारों मे
शरारत बातों ने की थी
बयां मैं दिल से करता हूँ।
तेरे रुखसार पर आँसू,
तेरे अंदाज की खुशबू
देखा मैंने नहीं कुछ भी,
मगर फिर भी मैं लिखता हूँ।।
Hello everyone!!
इस कविता के पीछे कहानी ये है कि एक प्रेमी जो प्रेम करता है उसने कभी उस व्यक्ति को देखा नहीं है जिससे वो प्रेम करता है लेकिन वो इतना प्रेममयी हो चुका है कि अब वो सिर्फ उसके वज़ूद से ही दिल लगा बैठा है। साथियों ये जरूरी नहीं कि ऐसा प्रेम सिर्फ एक प्रेमी का प्रेमिका से ही हो सकता है, दुनिया मे ऐसे कई रिश्ते आजकल बनते है computer की स्क्रीन के पीछे और कुछ समय बाद वो रिश्ते टूट जाते हैं या उन्हे तोड़ना पड़ता है.. बेशक वो रिश्ते कुछ पलों के होते हैं लेकिन मेरा मानना है कि कहीं न कहीं भावनाएं उन रिश्तों मे भी होती हैं.. तो मेरी ये कविता समर्पित है आप सभी को और अगर आप इसे अपनी जिन्दगी से जोड़ पा रहे हैं तो जरूर बताएं।।
धन्यवाद।